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मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से सीट शेयरिंग पर बैठक के बाद भी समाजवादी पार्टी को सीट नहीं मिलने से समाजवादी पार्टी अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व सीएम अखिलेश यादव बहुत गुस्से में हैं। अखिलेश ने कहा है कि जो व्यवहार कांग्रेस ने सपा के साथ एमपी में किया है, वही व्यवहार यूपी में कांग्रेस के साथ सपा करेगी। अखिलेश ने बताया कि कांग्रेस की तरफ से 6 सीट की बात की गई और फिर कमलनाथ और दिग्विजय सिंह से सपा नेताओं की रात एक बजे तक मीटिंग हुई, सीट पर दावे का आधार बताया गया लेकिन कांग्रेस ने जीरो सीट दिया। कांग्रेस ने 144 सीट पर कैंडिडेट की सूची निकाली तो उस सीट पर भी कैंडिडेट दे दिया जहां 2018 में सपा जीती थी। सपा ने कांग्रेस की सूची से पहले 7 नाम घोषित किए थे और अब 22 और कैंडिडेट उतार दिए हैं।
अखिलेश यादव इसी आक्रोश में इंडिया गठबंधन के औचित्य पर भी सवाल उठाया और कहा कि अगर उन्हें पता होता कि कांग्रेस धोखा देगी तो वो सपा नेताओं को ना तो एमपी कांग्रेस के नेताओं से मिलने भेजते, ना ही उनको सीटों की सूची देते और ना कांग्रेस वालों का फोन उठाते। फोन नहीं उठाने से 2018 की एक कहानी फिर से तैर रही है जब अखिलेश ने राहुल गांधी को फोन किया था और राहुल ने ना फोन उठाया और ना ही पलट कर कॉल किया। अखिलेश और राहुल ने हाथ मिलाकर 2017 का विधानसभा चुनाव लड़ा था लेकिन सपा-कांग्रेस का गठबंधन किसी के काम ना आया। नरेंद्र मोदी की लहर में सपा 224 से सीधे 47 पर पहुंच गई और कांग्रेस 28 से 7 पर आ गई। फिर सीएम बने योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम बने केशव प्रसाद मौर्य। दोनों ने अपनी-अपनी लोकसभा सीट गोरखपुर और फूलपुर से इस्तीफा दे दिया।
2018 में जब गोरखपुर और फूलपुर में लोकसभा उप-चुनाव की घोषणा हुई तो अखिलेश यादव ने दोनों सीट के लिए कैंडिडेट फाइनल किया तो कांग्रेस के समर्थन के लिए राहुल गांधी को फोन लगाया। राहुल गांधी ने अखिलेश का फोन ना लिया और ना बाद में वापस फोन किया। एक साल पहले विधानसभा चुनाव में भाई-भाई की तरह घूम रहे अखिलेश को राहुल के इस व्यवहार से बहुत चोट लगी। कांग्रेस की तरफ से बाद में गुलाम नबी आजाद ने अखिलेश से बात की लेकिन तब तक मायावती ने बसपा की तरफ से समर्थन दे दिया था। अखिलेश को कांग्रेस की कोई जरूरत नहीं थी। मजे की बात यह कि गुलाम नबी के जरिए कांग्रेस ने दो में एक लोकसभा सीट अपने लिए मांगी थी। अखिलेश ने दो टूक जवाब दे दिया।
कांग्रेस इतने पर ही नहीं रुकी। गोरखपुर में अखिलेश यादव ने निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद के बेटे प्रवीण निषाद को सपा के सिंबल पर लड़ाया तो कांग्रेस ने यहां से एक मुसलमान कैंडिडेट डॉक्टर सुरहिता करीम को लड़ा दिया जो गोरखपुर की मशहूर चिकित्सक हैं। प्रवीण निषाद साढ़े चार लाख वोट लाकर जीते और कांग्रेस कैंडिडेट को 19 हजार से कम वोट मिला। जवाहरलाल नेहरू की सीट रही फूलपुर में अखिलेश ने नागेंद्र प्रताप सिंह पटेल को उतारा तो कांग्रेस ने एक ब्राह्मण कैंडिडेट मनीष मिश्रा को लड़ा दिया। अतीक अहमद भी निर्दलीय लड़ गए। सपा यह सीट भी जीत गई। कांग्रेस की दोनों सीट पर जमानत जब्त हो गई। कांग्रेस को यूपी में अपनी औकात समझ में आई तो कुछ समय बाद कैराना लोकसभा और नूरपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में उसने सपा-बसपा-रालोद गठबंदन के कैंडिडेट को समर्थन दे दिया।
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जेडीयू नेता और बिहार के सीएम नीतीश कुमार की मिलनसार छवि और सबको मनाने का नतीजा निकला कि पटना से बेंगलुरु और मुंबई तक अखिलेश यादव, ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल जैसे कांग्रेस विरोधी नेता भी साथ बैठने के लिए तैयार हो गए। लेकिन मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के रवैए से सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव जिस कदर नाराज हुए हैं उसमें 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में इंडिया गठबंधन की नैया डगमगाती दिख रही है।
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अखिलेश यादव का यह कहना कि इंडिया एलायंस में लोकसभा चुनाव में ही गठबंधन होना है तो उस पर उसी समय विचार करेंगे, बहुत वजनदार बयान है। अखिलेश यादव ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अजय राय की हैसियत पूछकर और उन्हें चिरकुट बताकर प्रियंका गांधी को भी बता दिया है कि बड़बोले नेताओं की बयानबाजी कांग्रेस नहीं रोकेगी तो नुकसान होगा। अब राहुल गांधी को डैमेज कंट्रोल के अलावा और कोई विकल्प दिखता है तो उसका नुकसान दिलचस्प होगा।
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